छन्द हिन्दी साहित्य का एक महत्वपूर्ण तत्व है, जो कविता और काव्य रचनाओं को लय, गति तथा सौंदर्य प्रदान करता है। यह शब्दों और वर्णों को निश्चित नियमों के अनुसार व्यवस्थित करके रचना को प्रभावशाली बनाता है। इस लेख में हम जानेंगे कि छन्द क्या है, छन्द की परिभाषा (Chhand Ki Paribhasha), इसके प्रमुख भेद (Chhand Ke Bhed) तथा विभिन्न उदाहरण (Chhand Ke Udaharan) क्या हैं। छन्द का ज्ञान कविताओं को अधिक आकर्षक, मधुर और प्रभावशाली बनाने में सहायक होता है। आइए, हिन्दी भाषा और साहित्य के इस महत्वपूर्ण एवं रसपूर्ण विषय को विस्तार से समझें।
छंद की परिभाषा (Chhand Ki Paribhasha)
छंद (Chhand) हिंदी और संस्कृत काव्य का एक महत्वपूर्ण अंग है। ‘छंद’ शब्द की उत्पत्ति संस्कृत की ‘चद्’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ है – आनंद देना, प्रसन्न करना या आह्लादित करना। जब वर्णों या मात्राओं का एक निश्चित और नियमित क्रम काव्य में सौंदर्य, लय तथा मधुरता उत्पन्न करता है, तो उसे छंद कहा जाता है।
सरल शब्दों में, वर्णों अथवा मात्राओं की निश्चित संख्या और क्रमबद्ध व्यवस्था से उत्पन्न काव्यात्मक लय को छंद कहते हैं। छंद कविता को संगीतात्मक बनाता है और उसे सुनने या पढ़ने में आनंद प्रदान करता है।
छंद का सबसे प्राचीन उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। जिस प्रकार गद्य साहित्य के नियमों को व्याकरण नियंत्रित करता है, उसी प्रकार पद्य साहित्य के नियमों का निर्धारण छंदशास्त्र द्वारा किया जाता है।
छंदशास्त्र क्या है?
छंदों की रचना, उनके नियम, गुण-दोष तथा विभिन्न प्रकारों के अध्ययन को छंदशास्त्र कहा जाता है। आचार्य पिंगल द्वारा रचित ‘छंदःशास्त्र’ इस विषय का सबसे प्राचीन उपलब्ध ग्रंथ माना जाता है। इसी कारण छंदशास्त्र को पिंगलशास्त्र भी कहा जाता है।
छंद का अर्थ (Chhand Ka Arth)
संस्कृत और हिंदी साहित्य में छंद का सामान्य अर्थ लय या तालबद्धता से है। विशेष अर्थ में छंद उन नियमों को दर्शाता है जो कविता या गीत में वर्णों, मात्राओं, गति, यति और तुक के संतुलित प्रयोग को निर्धारित करते हैं।
किसी काव्य रचना में लघु और गुरु वर्णों, छोटी-बड़ी ध्वनियों तथा मात्राओं का संतुलित और निश्चित क्रम स्थापित होने पर वह एक विशेष छंद का रूप धारण कर लेती है। उदाहरण के लिए – दोहा, चौपाई, सोरठा, सवैया, आर्या और गायत्री छंद आदि।
छंद के माध्यम से कविता में न केवल लय आती है, बल्कि उसकी प्रभावशीलता और सौंदर्य भी बढ़ता है। इसलिए प्राचीन एवं मध्यकालीन हिंदी साहित्य की अधिकांश रचनाएँ किसी न किसी छंद के नियमों के अनुसार लिखी गई हैं।
छंद के प्रमुख तत्व
किसी भी Chhand की रचना में निम्नलिखित तत्व महत्वपूर्ण माने जाते हैं –
- वर्ण
- मात्रा
- यति (विराम)
- गति
- लय
- तुक
इन सभी नियमों का पालन करके कवि अपनी रचना को अधिक आकर्षक और प्रभावशाली बनाता है।
छंद के उदाहरण (Chhand Ke Udaharan)
1. दोहा छंद
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार।
बरनौ रघुबर बिमल जस, जो दायक फल चार ।।
2. सोरठा छंद
जो सुमिरत सिधि होय,
गननायक करिबर बदन।
करहु अनुग्रह सोय,
बुद्धि रासि सुभ गुन सदन।।
3. चौपाई छंद
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा,
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
अमिय मूरिमय चूरन चारू,
समन सकल भव रुज परिवारू।।
4. सवैया छंद
सेस गनेस महेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावै।।
जाहि अनादि अनंत अखण्ड, अछेद अभेद सुभेद बतावैं॥
नारद से सुक व्यास रहे, पचिहारे तौं पुनि पार न पावैं।
ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछ पै नाच नचावैं।।

छंद के अंग (Chhand Ke Ang)
हिंदी काव्यशास्त्र में छंद (Chhand) का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। किसी भी छंद की संरचना को समझने के लिए उसके विभिन्न अंगों का ज्ञान आवश्यक होता है। सामान्यतः छंद के सात प्रमुख अंग माने गए हैं, जो इस प्रकार हैं—
- चरण (पद/पाद)
- वर्ण और मात्रा
- संख्या और क्रम
- गण
- गति
- यति (विराम)
- तुक
1. छंद में चरण, पद या पाद (Charan in Chhand)
किसी भी Chhand का सामान्यतः चार भागों में विभाजन किया जाता है। छंद के प्रत्येक भाग को चरण, पद या पाद कहा जाता है।
दोहा, सोरठा जैसे कुछ छंदों में चार चरण होते हैं, लेकिन उन्हें केवल दो पंक्तियों में लिखा जाता है। ऐसी प्रत्येक पंक्ति को दल कहा जाता है।
कुछ विशेष छंद छह पंक्तियों में भी लिखे जाते हैं। ये दो अलग-अलग छंदों के मेल से बनते हैं, जैसे—
- कुण्डलिया (दोहा + रोला)
- छप्पय (रोला + उल्लाला)
चरण के प्रकार
समचरण – दूसरा और चौथा चरण समचरण कहलाते हैं।
विषमचरण – पहला और तीसरा चरण विषमचरण कहलाते हैं।
2. छंद में वर्ण और मात्रा (Varn Aur Matra in Chhand)
Chhand Shastra में वर्ण और मात्रा का विशेष महत्व है। छंद की गणना करते समय स्वर वर्णों और उनकी मात्राओं को आधार माना जाता है।
वर्ण क्या है?
जिस ध्वनि में एक स्वर का उच्चारण हो, उसे वर्ण या अक्षर कहा जाता है। चाहे वह स्वर ह्रस्व हो या दीर्घ, दोनों वर्ण माने जाते हैं।
जिन ध्वनियों में स्वर नहीं होता, उन्हें वर्ण नहीं माना जाता, जैसे—
- राजन् का ‘न्’
- कृष्ण का ‘ष्’
स्वर वर्ण के प्रकार
ह्रस्व वर्ण
अ, इ, उ, ऋ, क, कि, कु, कृ
दीर्घ वर्ण
आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, का, की, कू, के, कै, को, कौ
मात्रा क्या है?
किसी वर्ण के उच्चारण में लगने वाले समय को मात्रा कहते हैं।
- ह्रस्व स्वर = 1 मात्रा
- दीर्घ स्वर = 2 मात्राएँ
मात्रा के प्रकार
ह्रस्व मात्रा
अ, इ, उ, ऋ
दीर्घ मात्रा
आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
वर्ण और मात्रा की गणना
वर्ण गणना
- ह्रस्व वर्ण – एकमात्रिक
- दीर्घ वर्ण – द्विमात्रिक
मात्रा गणना
- ह्रस्व स्वर – 1 मात्रा
- दीर्घ स्वर – 2 मात्राएँ
वर्ण और मात्रा में मुख्य अंतर यह है कि वर्ण स्वरयुक्त अक्षर को दर्शाता है, जबकि मात्रा केवल स्वर के उच्चारण समय को दर्शाती है।
लघु और गुरु वर्ण
लघु वर्ण
ह्रस्व स्वर या ह्रस्व मात्रा वाले वर्णों को लघु कहा जाता है।
लघु का चिह्न – ।
उदाहरण:
- अ, इ, उ, ऋ
- क, कि, कु, कृ
- अँ, हँ
- नित्य का “त्य”
गुरु वर्ण
दीर्घ स्वर या दीर्घ मात्रा वाले वर्ण गुरु कहलाते हैं।
गुरु का चिह्न – ऽ
उदाहरण:
- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ
- का, की, कू, के, कै, को, कौ
- इंदु, बिंदु
- अतः, अधः
3. छंद में संख्या और क्रम (Sankhya Aur Kram)
वर्णों या मात्राओं की गणना को संख्या कहा जाता है, जबकि लघु और गुरु वर्णों के निश्चित स्थान को क्रम कहा जाता है।
वर्णिक छंद
वर्णिक छंदों में सभी चरणों में—
- वर्णों की संख्या समान होती है।
- लघु-गुरु का क्रम भी समान रहता है।
मात्रिक छंद
मात्रिक छंदों में—
- मात्राओं की संख्या समान होती है।
- लघु-गुरु का क्रम समान होना आवश्यक नहीं होता।
4. गण (Gan in Chhand)
गण केवल वर्णिक छंदों में प्रयुक्त होता है। गण का अर्थ है समूह।
छंदशास्त्र में तीन वर्णों के निश्चित समूह को गण कहा जाता है।
गण की परिभाषा
लघु और गुरु वर्णों के निश्चित क्रम से बने तीन वर्णों के समूह को गण कहते हैं।
गणों की संख्या
कुल आठ गण होते हैं—
- यगण
- मगण
- तगण
- रगण
- जगण
- भगण
- नगण
- सगण
गण याद रखने का सूत्र
“यमाताराजभानसलगा”
इस सूत्र के पहले आठ अक्षर आठ गणों का संकेत देते हैं, जबकि अंतिम दो अक्षर लघु (ल) और गुरु (ग) को दर्शाते हैं।
यगण का उदाहरण
सूत्र में “य” से शुरू करके अगले दो अक्षर “मा” और “ता” लेने पर “यमाता” बनता है।
यमाता = । ऽ ऽ
अर्थात् यगण का स्वरूप आदि लघु तथा बाद के दो गुरु वर्णों वाला होता है।
इसी प्रकार सूत्र “यमाताराजभानसलगा” की सहायता से अन्य सभी गणों की पहचान की जाती है।
| क्रमांक | गण का नाम | सूत्र | लक्षण | मात्रा क्रम | उदाहरण |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 | यगण | यमाता | आदि लघु | ।ऽऽ | भवानी |
| 2 | मगण | मातारा | तीनों गुरु | ऽऽऽ | कैकेई |
| 3 | तगण | ताराज | अंत्य लघु | ऽऽ। | आभार |
| 4 | रगण | राजभा | मध्य लघु | ऽ।ऽ | आरती |
| 5 | जगण | जभान | मध्य गुरु | ।ऽ। | गणेश |
| 6 | नगण | नसल | तीनों लघु | ।।। | कमल |
| 7 | भगण | मानस | आदि गुरु | ऽ।। | आदर |
| 8 | सगण | सलगा | अंत्य गुरु | ।।ऽ | चमचा |
5. छंद में गति (Gati in Chhand)
गति से आशय छंद को पढ़ते समय उत्पन्न होने वाले प्रवाह, ताल और लय से है। किसी कविता के सहज और मधुर पाठ में गति का महत्वपूर्ण योगदान होता है। विशेष रूप से मात्रिक छंदों में गति का महत्व अधिक माना जाता है।
वर्णिक छंदों में लघु और गुरु वर्णों का क्रम निश्चित रहता है, इसलिए उनकी लय स्वतः नियंत्रित होती है। इसके विपरीत, मात्रिक छंदों में केवल मात्राओं की संख्या निर्धारित होती है, जबकि लघु-गुरु का क्रम निश्चित नहीं होता। ऐसी स्थिति में यदि शब्दों का विन्यास उचित न हो तो छंद की लय बाधित हो सकती है।
उदाहरण के लिए—
- “दिवस का अवसान था समीप” – इसमें प्रवाह अपेक्षाकृत कम है।
- “दिवस का अवसान समीप था” – इसमें गति अधिक स्वाभाविक और सुगम प्रतीत होती है।
चौपाई, अरिल्ल और पद्धरि जैसे छंदों के प्रत्येक चरण में 16-16 मात्राएँ होती हैं, फिर भी गति के अंतर के कारण ये एक-दूसरे से भिन्न माने जाते हैं।
इसलिए किसी भी Chhand के शुद्ध और प्रभावी प्रयोग के लिए गति का सही ज्ञान आवश्यक है। गति की समझ भाषा के स्वभाव, ध्वनि-सौंदर्य और नियमित अभ्यास से विकसित होती है।
6. छंद में यति या विराम (Yati / Viram in Chhand)
यति या विराम वह स्थान है जहाँ छंद पढ़ते समय कुछ क्षण के लिए रुकना पड़ता है। यह रुकाव निर्धारित वर्णों या मात्राओं के बाद आता है और छंद की लय को संतुलित बनाए रखता है।
सरल शब्दों में, छंद के भीतर निश्चित स्थान पर लिया गया विराम यति कहलाता है।
यति की विशेषताएँ
- छोटे छंदों में यति सामान्यतः चरण के अंत में होती है।
- बड़े छंदों में एक ही चरण के भीतर एक से अधिक यतियाँ हो सकती हैं।
- अधिकांश छंदों की परिभाषा में यति का स्थान पहले से निर्धारित रहता है।
उदाहरण
मालिनी छंद में—
- पहली यति 8 वर्णों के बाद आती है।
- दूसरी यति 7 वर्णों के बाद आती है।
यति का सही प्रयोग छंद को स्पष्टता, मधुरता और प्रभाव प्रदान करता है।
7. छंद में तुक (Tuk in Chhand)
किसी छंद के चरणों के अंत में समान ध्वनि, समान वर्ण या अक्षर-साम्य की स्थापना को तुक कहा जाता है। तुक कविता में मधुरता और श्रवण-सौंदर्य उत्पन्न करती है।
जिस छंद में चरणों के अंत में तुक मिलती है, उसे तुकांत छंद कहा जाता है। वहीं जिस छंद में तुक का प्रयोग नहीं होता, उसे अतुकांत छंद कहा जाता है।
अंग्रेज़ी साहित्य में अतुकांत कविता को Blank Verse के नाम से जाना जाता है।
तुक के प्रकार
1. तुकांत कविता
जब कविता की पंक्तियों या चरणों के अंत में समान ध्वनि या वर्णों की पुनरावृत्ति होती है, तो उसे तुकांत कविता कहा जाता है।
उदाहरण:
हमको बहुत ही भाती हिंदी।
हमको बहुत है प्यारी हिंदी।।
यहाँ दोनों पंक्तियों के अंत में “हिंदी” शब्द आने से तुकांतता बनी हुई है।
2. अतुकांत कविता
जब कविता की पंक्तियों के अंत में किसी प्रकार की ध्वनि-समानता या तुक का प्रयोग नहीं होता, तो उसे अतुकांत कविता कहा जाता है।
आधुनिक हिंदी साहित्य की अधिकांश नई कविताएँ अतुकांत शैली में लिखी जाती हैं। इनमें कवि विचारों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति पर अधिक ध्यान देता है, न कि तुकबंदी पर।
“काव्य सर्जक हूँ
प्रेरक तत्वों के अभाव में
लेखनी अटक गई हैं
काव्य-सृजन हेतु
तलाश रहा हूँ उपादान।”
Chhand के प्रमुख रूप से 4 प्रकार के भेद होते हैं-
- वर्णिक छंद (या वृत): जिस छंद के सभी चरणों में वर्णों की संख्या समान हो।
- वर्णिक वृत छंद (सम छंद): इसमें वर्णों की गणना होती है
- मात्रिक छंद (या जाति):- जिस छंद के सभी चरणों में मात्राओं की संख्या समान हो।
- मुक्त छंद:- जिस छंद में वर्णिक या मात्रिक प्रतिबंध न हो।
1. वर्णिक छंद
वर्णिक छंद के सभी चरणों में वर्णों की संख्या समान रहती है, और लघु-गुरु का क्रम समान रहता है।
परिभाषा– जिस छंद के सभी चरणों में वर्णों की संख्या समान होती हैं उन्हें “वर्णिक छंद” कहा जाता है। या केवल वर्णों के गणना के आधार पर लिखे गए छन्द को “वर्णिक छन्द” कहते हैं।
कुछ वर्णिक छंद के नाम
कुछ वर्णिक छंद के नाम निम्नलिखित हैं-
| सवैया (22–26 वर्ण) | मालिनी (15 वर्ण) | प्रमाणिका (8 वर्ण) |
|---|---|---|
| स्वागता (11 वर्ण) | भुजंगी (11 वर्ण) | शालिनी (11 वर्ण) |
| इन्द्रवज्रा (11 वर्ण) | दोधक (11 वर्ण) | वंशस्थ (12 वर्ण) |
| भुजंगप्रयात (12 वर्ण) | द्रुतविलम्बित (12 वर्ण) | तोटक (12 वर्ण) |
| वसंततिलका (14 वर्ण) | पंचचामर (16 वर्ण) | चंचला (16 वर्ण) |
| मन्दाक्रान्ता (17 वर्ण) | शिखरिणी (17 वर्ण) | शार्दूल विक्रीड़ित (19 वर्ण) |
| स्त्रग्धरा (21 वर्ण) | घनाक्षरी (31 वर्ण) | रूपघनाक्षरी (32 वर्ण) |
| देवघनाक्षरी (33 वर्ण) | कवित्त/मनहरण (31–33 वर्ण) | — |
वर्णिक छंद (Varnik Chhand)
वर्णिक छंदों में प्रत्येक चरण में वर्णों की संख्या निर्धारित होती है। इन छंदों की रचना मुख्य रूप से वर्णों की गणना के आधार पर की जाती है। इनमें वर्णों की संख्या, उनका क्रम, गण-विधान तथा लघु-गुरु की व्यवस्था महत्वपूर्ण होती है।
उदाहरण – मालिनी छंद
प्रिय-पति वह मेरा प्राणप्यारा कहाँ है।
दुख-जलधि निमग्ना का सहारा कहाँ है।
अब तक जिसको मैं देख के जी सकी हूँ।
वह हृदय हमारा नेत्र-तारा कहाँ है॥
वर्णिक छंद के प्रकार
वर्णिक छंद मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं—
1. साधारण वर्णिक छंद
जिन छंदों के प्रत्येक चरण में 26 या उससे कम वर्ण होते हैं, उन्हें साधारण वर्णिक छंद कहा जाता है।
2. दण्डक वर्णिक छंद
जिन छंदों के चरणों में 26 से अधिक वर्ण होते हैं, वे दण्डक वर्णिक छंद कहलाते हैं।
वर्णिक वृत्त छंद (Varnik Vrit Chhand)
वर्णिक वृत्त छंद में वर्णों की संख्या के साथ-साथ लघु और गुरु वर्णों का क्रम भी निश्चित रहता है। इसके प्रत्येक छंद में सामान्यतः चार चरण होते हैं और सभी चरणों में समान संरचना का पालन किया जाता है। इसी कारण इसे सम छंद भी कहा जाता है।
प्रमुख वर्णिक वृत्त छंद
- मत्तगयन्द सवैया
- द्रुतविलम्बित
- मालिनी
- वसंततिलका
- शार्दूल विक्रीड़ित
मत्तगयन्द सवैया का उदाहरण
इस छंद में सात भगण (ऽ।।) और दो गुरु (ऽ) का विधान होता है।
ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽ।।
या लकुटी अरु कामरिया पर,
ऽ।। ऽ।। ऽ।। ऽऽ
राज तिहुँ पुर को तजि डारौ।
यह उदाहरण वर्णिक वृत्त छंद की निश्चित लघु-गुरु संरचना को स्पष्ट करता है।
मात्रिक छंद (Matrik Chhand)
जिस छंद की रचना मात्राओं की गणना के आधार पर की जाती है, उसे मात्रिक छंद कहा जाता है। इसमें प्रत्येक चरण में मात्राओं की संख्या समान रहती है, जबकि लघु-गुरु के क्रम का बंधन आवश्यक नहीं होता।
मात्रिक छंदों में मात्रा, यति, गति तथा लय का विशेष महत्व होता है।
उदाहरण
बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिय मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
मात्रिक छंद के भेद
मात्रिक छंदों को मुख्य रूप से तीन वर्गों में बाँटा जाता है—
1. सममात्रिक छंद
जिस छंद के सभी चरणों में मात्राओं की संख्या समान हो, उसे सममात्रिक छंद कहते हैं।
उदाहरण:
मुझे नहीं ज्ञात कि मैं कहाँ हूँ,
प्रभो! यहाँ हूँ अथवा वहाँ हूँ।
2. अर्धसममात्रिक छंद
जिस छंद में पहला और तीसरा चरण समान हों तथा दूसरा और चौथा चरण भी समान हों, लेकिन दोनों समूह एक-दूसरे से भिन्न हों, उसे अर्धसममात्रिक छंद कहा जाता है।
दोहा और सोरठा इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
3. विषममात्रिक छंद
जिस छंद के चरणों में समानता का कोई निश्चित क्रम न हो और सभी चरण अलग-अलग मात्रा-विन्यास रखते हों, उसे विषममात्रिक छंद कहते हैं।
ऐसे छंदों का प्रयोग अपेक्षाकृत कम किया जाता है।
प्रमुख मात्रिक छंद
हिंदी साहित्य में प्रचलित कुछ प्रमुख मात्रिक छंद निम्नलिखित हैं—
सममात्रिक छंद
- चौपाई
- रोला
- गीतिका
- हरिगीतिका
- वीर छंद
- ताटंक
- सार
अर्धसममात्रिक छंद
- दोहा
- सोरठा
विषममात्रिक छंद
- कुण्डलिया
- छप्पय
- अहीर (11 मात्रा)
- तोमर (12 मात्रा)
- मानव (14 मात्रा)
- अरिल्ल (16 मात्रा)
- पद्धरि/पद्धटिका (16 मात्रा)
- चौपाई (16 मात्रा)
- पीयूषवर्ष (19 मात्रा)
- सुमेरु (19 मात्रा)
- राधिका (22 मात्रा)
- रोला (24 मात्रा)
- दिक्पाल (24 मात्रा)
- रूपमाला (24 मात्रा)
- गीतिका (26 मात्रा)
- सरसी (27 मात्रा)
- सार (28 मात्रा)
- हरिगीतिका (28 मात्रा)
- तांटक (30 मात्रा)
- वीर या आल्हा (31 मात्रा)।
अर्द्धसम मात्रिक छंद :
- बरवै (विषम चरण में – 12 मात्रा, सम चरण में – 7 मात्रा)
- दोहा (विषम – 13, सम – 11)
- सोरठा (दोहा का उल्टा, विषम – 11, सम – 13)
- उल्लाला (विषम – 15, सम – 13)
विषम मात्रिक छंद :
- कुण्डलिया (दोहा + रोला)
- छप्पय (रोला + उल्लाला)
| अहीर (11 मात्रा) | तोमर (12 मात्रा) | मानव (14 मात्रा) |
|---|---|---|
| अरिल्ल (16 मात्रा) | पद्धरि/पद्धटिका (16 मात्रा) | चौपाई (16 मात्रा) |
| पीयूषवर्ष (19 मात्रा) | सुमेरु (19 मात्रा) | राधिका (22 मात्रा) |
| रोला (24 मात्रा) | दिक्पाल (24 मात्रा) | रूपमाला (24 मात्रा) |
| गीतिका (26 मात्रा) | सरसी (27 मात्रा) | सार (28 मात्रा) |
| हरिगीतिका (28 मात्रा) | तांटक (30 मात्रा) | वीर या आल्हा (31 मात्रा) |
अर्द्धसम मात्रिक छंद :
- बरवै (विषम चरण में – 12 मात्रा, सम चरण में – 7 मात्रा)
- दोहा (विषम – 13, सम – 11)
- सोरठा (दोहा का उल्टा, विषम – 11, सम – 13)
- उल्लाला (विषम – 15, सम – 13)
विषम मात्रिक छंद :
- कुण्डलिया (दोहा + रोला)
- छप्पय (रोला + उल्लाला)
4. मुक्त छंद
जिस विषय छंद में वर्णित या मात्रिक प्रतिबंध न हो, न प्रत्येक चरण में वर्णों की संख्या और क्रम समान हो और मात्राओं की कोई निश्चित व्यवस्था हो तथा जिसमें नाद और ताल के आधार पर पंक्तियों में लय लाकर उन्हें गतिशील करने का आग्रह हो, वह मुक्त छंद है।
- उदाहरण : निराला की कविता ‘जूही की कली‘ इत्यादि।
मुक्त छंद को आधुनिक युग की देन माना जाता है। जिन छंदों में वर्णों और मात्राओं का बंधन नहीं होता उन्हें मुक्तक छंद कहते हैं अथार्त हिंदी में स्वतंत्र रूप से आजकल लिखे जाने वाले छंद मुक्त छंद होते हैं। चरणों की अनियमित, असमान, स्वछन्द गति और भाव के अनुकूल यति विधान ही मुक्त छंद की विशेषता है। इसे रबर या केंचुआ छंद भी कहते हैं। इनमे न वर्णों की और न ही मात्राओं की गिनती होती है। जैसे :-
वह आता
दो टूक कलेजे के करता पछताता
पथ पर आता।
पेट पीठ दोनों मिलकर हैं एक ,
चल रहा लकुटिया टेक ,
मुट्ठी भर दाने को भूख मिटाने को
मुँह फटी पुरानी झोली का फैलता
दो टूक कलेजे के कर्ता पछताता पथ पर आता।
प्रमुख मात्रिक छंद : Pramukh Matrik Chhand
- दोहा छंद
- सोरठा छंद
- रोला छंद
- गीतिका छंद
- हरिगीतिका छंद
- उल्लाला छंद
- चौपाई छंद
- बरवै (विषम) छंद
- छप्पय छंद
- कुंडलियाँ छंद
- दिगपाल छंद
- आल्हा या वीर छंद
- सार छंद
- तांटक छंद
- रूपमाला छंद
- त्रिभंगी छंद
1. दोहा छंद –
यह अर्धसममात्रिक छंद होता है। ये सोरठा छंद के विपरीत होता है। इसमें पहले और तीसरे चरण में 13-13 तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ होती हैं। इसमें चरण के अंत में लघु (1) होना जरूरी होता है। जैसे :-
दोहा छंद के उदाहरण 1-
कारज धीरे होत है, (ऽ।। ऽऽ ऽ। ऽ) = 13 मात्राएं
काहे होत अधीर। (ऽऽ ऽ। ।ऽ।) = 11 मात्राएं
समय पाय तरुवर फरै,(।।। ऽ। ।।।। ।ऽ) = 13 मात्राएं
केतक सींचो नीर।। (ऽ।। ऽऽ ऽ।) = 11 मात्राएं
उपरोक्त उदाहरण में पहले और तीसरे चरण में 13-13 तथा दूसरे और चौथे चरण में 11-11 मात्राएँ हैं, अतः यह दोहा छंद का उदाहरण है। इसी प्रकार-
दोहा छंद के उदाहरण 2-
मुरली वाले मोहना,
मुरली नेक बजाय।
तेरी मुरली मन हरे,
घर अँगना न सुहाय॥
दोहा छंद के उदाहरण 3-
श्रीगुरू चरन सरोज रज,
निज मन मुकुर सुधारि।
बरनउं रघुबर बिमल जसु,
जो दायकु फल चारि।।
दोहा छंद के उदाहरण 4-
रात-दिवस, पूनम-अमा,
सुख-दुःख, छाया-धूप।
यह जीवन बहुरूपिया,
बदले कितने रूप॥
दोहा छंद के उदाहरण 5-
बड़ा हुआ तो क्या हुआ,
जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं,
फल लागैं अति दूर।।
2. सोरठा छंद :-
यह अर्धसममात्रिक छंद होता है। ये दोहा छंद के विपरीत होता है। इसमें पहले और तीसरे चरण में 11-11 तथा दूसरे और चौथे चरण में 13-13 मात्राएँ होती हैं। यह दोहा का उल्टा होता है। विषम चरणों के अंत में एक गुरु और एक लघु मात्रा का होना जरूरी होता है।तुक प्रथम और तृतीय चरणों में होता है। जैसे :-
(अ) सोरठा छंद के उदाहरण
lS l SS Sl SS ll lSl Sl
कहै जु पावै कौन , विद्या धन उद्दम बिना।
S SS S Sl lS lSS S lS
ज्यों पंखे की पौन, बिना डुलाए ना मिलें।
(ब) सोरठा छंद के उदाहरण
जो सुमिरत सिधि होय, गननायक करिबर बदन।
करहु अनुग्रह सोय, बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥
3. रोला छंद –
यह एक मात्रिक छंद होता है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके प्रत्येक चरण में 11 और 13 के क्रम से 24 मात्राएँ होती हैं। इसे अंत में दो गुरु और दो लघु वर्ण होते हैं। जैसे :-
(अ) रोला छंद का उदाहरण
SSll llSl lll ll ll Sll S
नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है।
सूर्य चन्द्र युग-मुकुट मेखला रत्नाकर है।
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मंडन है।
बंदी जन खग-वृन्द, शेष फन सिंहासन है।
(ब) रोला छंद का उदाहरण
यही सयानो काम, राम को सुमिरन कीजै।
पर-स्वारथ के काज, शीश आगे धर दीजै॥
4. गीतिका छंद –
यह मात्रिक छंद होता है। इसके चार चरण होते हैं। हर चरण में 14 और 12 के करण से 26 मात्राएँ होती हैं। अंत में लघु और गुरु होता है। जैसे :-
गीतिका छंद का उदाहरण –
S SS SlSS Sl llS SlS
हे प्रभो आनंददाता ज्ञान हमको दीजिये।
शीघ्र सारे दुर्गुणों को दूर हमसे कीजिये।
लीजिए हमको शरण में, हम सदाचारी बने।
ब्रह्मचारी, धर्मरक्षक वीर व्रतधारी बनें।
5. हरिगीतिका छंद-
यह मात्रिक छंद होता है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके हर चरण में 16 और 12 के क्रम से 28 मात्राएँ होती हैं। इसके अंत में लघु गुरु का प्रयोग अधिक प्रसिद्ध है। जैसे :-
हरिगीतिका छंद का उदाहरण-
SS ll Sll S S S lll SlS llS
मेरे इस जीवन की है तू, सरस साधना कविता।
मेरे तरु की तू कुसुमित , प्रिय कल्पना लतिका।
मधुमय मेरे जीवन की प्रिय,है तू कल कामिनी।
मेरे कुंज कुटीर द्वार की, कोमल चरण-गामिनी।
6. उल्लाला छंद –
यह मात्रिक छंद होता है। इसके हर चरण में 15 और 13 के क्रम से 28 मात्राएँ होती है। जैसे :-
उल्लाला छंद का उदाहरण –
llS llSl lSl S llSS ll Sl S
करते अभिषेक पयोद हैं, बलिहारी इस वेश की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही, सगुण-मूर्ति सर्वेश की।
7. चौपाई छंद –
चौपाई छंद एक मात्रिक छंद होता है। इसमें चार चरण होते हैं। इसके हर चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। चरण के अंत में गुरु या लघु नहीं होता है लेकिन दो गुरु और दो लघु हो सकते हैं। अंत में गुरु वर्ण होने से छंद में रोचकता आती है। जैसे :-
चौपाई छंद का उदाहरण – 1
।। ।। ऽ। ।।। ।।ऽऽ
एहि बिधि राम सबहि समुझावा।
।। ।। ।।। ।।। ।। ऽऽ
गुरु पद पदुम हरषि सिरु नावा॥
।।।। ऽ। ।ऽ। ।ऽऽ
गनपति गौरि गिरीसु मनाई।
।। ।ऽ। ऽ। ।।ऽऽ
चले असीस पाइ रघुराई॥
स्पष्टीकरण:- उपरोक्त सभी चरणों मे 16 मात्राएं है अतः यहाँ पर चौपाई छंद है।
चौपाई छंद का उदाहरण – 2
बंदऊँ गुरु पद पदुम परागा।
सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
अमिअ मूरिमय चूरन चारू।
समन सकल भव रुज परिवारू॥
चौपाई छंद का उदाहरण – 3
।। ।। ।।। ।।। ।। ऽऽ
बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥
8. बरवै (विषम) छंद –
इसमें पहले और तीसरे चरण में 12 और दूसरे और चौथे चरण में 7 मात्राएँ होती हैं। सम चरणों के अंत में जगण और तगण के आने से मिठास बढती है। यति को प्रत्येक चरण के अंत में रखा जाता है। जैसे –
बिषम छंद के उदाहरण –
चम्पक हरवा अंग मिलि अधिक सुहाय।
जानि परै सिय हियरे, जब कुम्हिलाय।
9. छप्पय छंद –
इस छंद में 6 चरण होते हैं। पहले चार चरण रोला छंद के होते हैं और अंत के दो चरण उल्लाला छंद के होते हैं। प्रथम चार चरणों में 24 मात्राएँ और बाद के दो चरणों में 26-26 या 28-28 मात्राएँ होती हैं। जैसे –
छप्पय छंद का उदाहरण –
नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है।
सूर्य-चन्द्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर है।
नदिया प्रेम-प्रवाह, फूल -तो मंडन है।
बंदी जन खग-वृन्द, शेषफन सिंहासन है।
करते अभिषेक पयोद है, बलिहारी इस वेश की।
हे मातृभूमि! तू सत्य ही,सगुण मूर्ति सर्वेश की।।
10. कुंडलियाँ छंद :
कुंडलियाँ विषम मात्रिक छंद होता है। इसमें 6 चरण होते हैं। शुरू के 2 चरण दोहा और बाद के 4 चरण रोला छंद के होते हैं। इस तरह हर चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। छंद का आरंभिक वर्ण और अंतिम वर्ण समान होता है। दोहा छंद का अंतिम चरण रोला छंद के प्रारंभ में दोहराया जाता है। जैसे –
(अ) कुंडलियाँ छंद के उदाहरण
ऽऽ ऽ। । ऽ । ऽ ऽ ऽ ऽ ।। ऽ।
बीती ताहि बिसारि दे, आगे की सुधि लेहु ।
जो बनि आवै सहज, में, ताही में चित्त देहू ॥ (दोहा)
ताहि में चित देहु, बात जोई बनि आवै।
दुर्जन हंसे न कोय, चित में खेद न पावै ॥
कह ‘गिरधर’ कविराम, यहै करमन परतीती।
आगे की सुधि लेहु, समुझि बीती सी बीती ॥ (रोला)
यह कुण्डली ‘बीती’ से शुरू होकर ‘बीती’ पर ही समाप्त हुई है। ‘ताही में चित्त देहु’ की आवृत्ति तीसरी पंक्ति में हुई है।
(ब) कुंडलियाँ छंद के उदाहरण
कमरी थोरे दाम की, बहुतै आवै काम।
खासा मलमल वाफ्ता, उनकर राखै मान॥
उनकर राखै मान, बँद जहँ आड़े आवै।
बकुचा बाँधे मोट, राति को झारि बिछावै॥
कह ‘गिरिधर कविराय’, मिलत है थोरे दमरी।
सब दिन राखै साथ, बड़ी मर्यादा कमरी॥
(स) कुंडलियाँ छंद के उदाहरण
रत्नाकर सबके लिए, होता एक समान।
बुद्धिमान मोती चुने, सीप चुने नादान॥
सीप चुने नादान,अज्ञ मूंगे पर मरता।
जिसकी जैसी चाह,इकट्ठा वैसा करता।
‘ठकुरेला’ कविराय, सभी खुश इच्छित पाकर।
हैं मनुष्य के भेद, एक सा है रत्नाकर॥
11. दिगपाल छंद –
इसके हर चरण में 12-12 के विराम से 24 मात्राएँ होती हैं। जैसे –
दिगपाल छंद के उदाहरण –
हिमाद्रि तुंग-श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती।
स्वयं प्रभा समुज्ज्वला स्वतंत्रता पुकारती।
अमर्त्य वीर पुत्र तुम, दृढ प्रतिज्ञ सो चलो।
प्रशस्त पुण्य-पंथ है, बढ़े चलो-बढ़े चलो।।
12. आल्हा या वीर छंद
इसमें 16 -15 की यति से 31 मात्राएँ होती हैं। छंद में विषम चरण का अंत गुरु (ऽ) या लघुलघु (।।) या लघु लघु गुरु (।।ऽ) या गुरु लघु लघु (ऽ ।।) से तथा सम चरण का अंत गुरु लघु (ऽ।) से होना अनिवार्य है। विषम (पहले व तीसरे) चरण में 16 मात्राएँ, सम (दूसरे व चौथे) चरण में 15 मात्राएँ होती हैं। इसे आल्हा छंद या मात्रिक सवैया या वीर छंद भी कहते हैं।
कर में गह करवाल घूमती, रानी बनी शक्ति साकार।
सिंहवाहिनी, शत्रुघातिनी सी करती थी अरि संहार।
अश्ववाहिनी बाँध पीठ पै, पुत्र दौड़ती चारों ओर।
अंग्रेजों के छक्के छूटे, दुश्मन का कुछ, चला न जोर।।
13. सार छंद
इसे ललित पद भी कहते हैं। सार छंद में 28 मात्राएँ होती हैं। इसमें 16-12 पर यति होती है, और बाद में दो गुरु होते हैं। दो,दो अथवा चारो पक्तियों में तुकान्त सुमेलित किये जाते हैं।
इक-दिन सब-कुछ छोड़-छाड़ ये,पंछी उड़ जाएगा।
क्या खोया क्या पाया जग में,सोच नहीं पाएगा।
दान-पुण्य-उपकारों से तू,भर ले अपनी झोली।
याद रखेगी दुनिया केवल,तेरी मीठी बोली।
14. ताटंक छंद –
इसके हर चरण में 16,14 की यति से 30 मात्राएँ होती हैं। अंत में 3 गुरु होते हैं।
फूलों की डोली में आई,शर्माती बरखा रानी।
इठलाती इतराती आई,कर बैठी कुछ नादानी।
बादल गरजे बिजली चमकी,झूम-झूम बरसा पानी।
भीग गया गोरी का आँचल,चिपक गई चुनरी धानी।
15. रूपमाला छंद / मदन छन्द-
इसके हर चरण में 24 मात्राएँ होती हैं। 14 और 10 मात्राओं पर विराम होता है। अंत में गुरु लघु होना चाहिए। दो-दो पदों पर तुकान्तता बनती है।
रावरे मुख के बिलोकत ही भए दुख दूरि।
सुप्रलाप नहीं रहे उर मध्य आनँद पूरि।
देह पावन हो गयो पदपद्म को पय पाइ।
पूजतै भयो वश पूजित आशु हो मनुराइ।।
16. त्रिभंगी छंद
यह छंद 32 मात्राओं का होता है। 10,8,8,6 पर यति होती है और अंत में गुरु होता है। इस छंद का प्रत्येक पद तीन बार भंग होता है, इसलिए इसे त्रिभंगी छंद कहते हैं।
नित सुर मुनि गावत, भजन सुनावत, भाग्य मनावत, नाचत है।
मधु ढोल मजीरा, हरते पीरा, सुखी शरीरा, धावत है।
हरि भक्त मंडली, सदा मंगली, झूम झूम सुख, पावत है।
प्रभु आते सुनने, दुख को हरने, भाव विमल बन, आवत है।।
मात्रिक छन्द की मात्राएं-
| दोहा | 24 मात्राएँ , विषम चरण में 13-13 मात्राएँ , सम चरण में 11-11 मात्राएँ |
| चौपाई | प्रत्येक चरण में 16 मात्राएँ, चरण के अन्त में दो गुरु |
| सोरठा | विषम चरण में 11-11 मात्राएँ, सम चरण में 13-13 मात्राएँ |
| रोला | प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ , 13 मात्राओं पर ‘यति’ |
| कुण्डलिया | प्रत्येक चरण में 24 मात्राएँ, प्रथम दो चरण दोहा, बाद के चार चरण रोला |
| बरवै | विषम चरण में 12-12 मात्राएँ, सम चरण में 7-7 मात्राएँ |
| हरिगीतिका | प्रत्येक चरण में 28 मात्राएँ, अन्त में लघु और गुरु, 16 व 12 मात्राओं पर यति |
| उल्लाला | विषम चरण में 15-15 मात्राएँ, सम चरण में 13-13 मात्राएँ |
| छप्पय | प्रथम चार चरण रोला, अन्तिम दो चरण उल्लाला |
| गीतिका | कुल 26 मात्राएँ , 14-12 पर यति, चरण के अन्त में लघु-गुरु आवश्यक |
| वीर | कुल 31 मात्राएँ , प्रत्येक चरण में 16, 15 पर यति, गुरु-लघु होना आवश्यक |
प्रमुख वर्णिक छंद : Pramukh Varnik Chhand
- सवैया छंद
- कवित्त छंद
- द्रुत विलम्बित छंद
- मालिनी छंद
- मंद्रक्रांता छंद
- इंद्र्व्रजा छंद
- उपेंद्रवज्रा छंद
- अरिल्ल छंद
- लावनी छंद
- राधिका छंद
- त्रोटक छंद
- भुजंग छंद
- वियोगिनी छंद
- वंशस्थ छंद
- शिखरिणी छंद
- शार्दूलविक्रीडित छंद
- मत्तगयंग छंद
1. सवैया छंद –
इसके हर चरण में 22 से 26 वर्ण होते हैं। इसमें एक से अधिक छंद होते हैं। ये अनेक प्रकार के होते हैं और इनके नाम भी अलग -अलग प्रकार के होते हैं। सवैया में एक ही वर्णिक गण को बार-बार आना चाहिए। इनका निर्वाह नहीं होता है। जैसे –
सवैया छंद के उदाहरण –
लोरी सरासन संकट कौ,
सुभ सीय स्वयंवर मोहि बरौ।
नेक ताते बढयो अभिमानंमहा,
मन फेरियो नेक न स्न्ककरी।
सो अपराध परयो हमसों,
अब क्यों सुधरें तुम हु धौ कहौ।
बाहुन देहि कुठारहि केशव,
आपने धाम कौ पंथ गहौ।।
2. कवित्त छंद (मन हर, मनहरण, घनाक्षरी) –
यह वर्णिक सम छंद होता है। इसके हर चरण में 31 से 33 वर्ण होते हैं और अंत में तीन लघु होते हैं। 16, 17 वें वर्ण पर विराम होता है। जैसे :-
कवित्त छंद के उदाहरण
मेरे मन भावन के भावन के ऊधव के आवन की
सुधि ब्रज गाँवन में पावन जबै लगीं।
कहै रत्नाकर सु ग्वालिन की झौर-झौर
दौरि-दौरि नन्द पौरि,आवन सबै लगीं।
उझकि-उझकि पद-कंजनी के पंजनी पै,
पेखि-पेखि पाती,छाती छोहन सबै लगीं।
हमको लिख्यौ है कहा,हमको लिख्यौ है कहा,
हमको लिख्यौ है कहा,पूछ्न सबै लगी।।
3. द्रुत विलम्बित छंद –
हर चरण में 12 वर्ण , एक नगण , दो भगण तथा एक सगण होते हैं। जैसे –
द्रुत विलम्बित छंद के उदाहरण
दिवस का अवसान समीप था,
गगन था कुछ लोहित हो चला।
तरु शिखा पर थी अब राजती,
कमलिनी कुल-वल्लभ की प्रभा।।
4. मालिनी छंद –
इस वर्णिक सम वृत छंद में 15 वर्ण होते हैं दो तगण , एक मगण , दो यगण होते हैं। आठ , सात वर्ण एवं विराम होता है। जैसे –
मालिनी छंद के उदाहरण
प्रभुदित मथुरा के मानवों को बना के,
सकुशल रह के औ विध्न बाधा बचाके।
निज प्रिय सूत दोनों , साथ ले के सुखी हो,
जिस दिन पलटेंगे, गेह स्वामी हमारे।।
5. मंदाक्रांता छंद-
इसके हर चरण में 17 वर्ण होते हैं। एक भगण , एक नगण , दो तगण , और दो गुरु होते हैं। 5, 6 तथा 7 वें वर्ण पर विराम होता है। जैसे –
मद्रकान्ता छंद के उदाहरण –
कोई क्लांता पथिक ललना चेतना शून्य होक़े,
तेरे जैसे पवन में , सर्वथा शान्ति पावे।
तो तू हो के सदय मन, जा उसे शान्ति देना,
ले के गोदी सलिल उसका, प्रेम से तू सुखाना।।
6. इन्द्रव्रजा छंद –
इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण , दो जगण और बाद में 2 गुरु होते हैं। जैसे –
इन्द्रव्रजा छंद के उदाहरण –
माता यशोदा हरि को जगावै।
प्यारे उठो मोहन नैन खोलो।
द्वारे खड़े गोप बुला रहे हैं।
गोविन्द, दामोदर माधवेति।।
7. उपेन्द्रव्रजा छंद –
इसके प्रत्येक चरण में 11 वर्ण , 1 नगण , 1 तगण , 1 जगण और बाद में 2 गुरु होता हैं। जैसे –
उपेन्द्रव्रजा छंद के उदाहरण –
पखारते हैं पद पद्म कोई,
चढ़ा रहे हैं फल -पुष्प कोई।
करा रहे हैं पय-पान कोई
उतारते श्रीधर आरती हैं।।
8. अरिल्ल छंद –
हर चरण में 16 मात्राएँ होती हैं। इसके अंत में लघु या यगण होना चाहिए। जैसे –
अरिल्ल छंद के उदाहरण –
मन में विचार इस विधि आया।
कैसी है यह प्रभुवर माया।
क्यों आगे खड़ी है विषम बाधा।
मैं जपता रहा, कृष्ण-राधा।।
9. लावनी छंद –
इसके हर चरण में 22 मात्राएँ और चरण के अंत में गुरु होते हैं। जैसे –
लावनी छंद के उदाहरण –
धरती के उर पर जली अनेक होली।
पर रंगों से भी जग ने फिर नहलाया।
मेरे अंतर की रही धधकती ज्वाला।
मेरे आँसू ने ही मुझको बहलाया।।
10. राधिका छंद –
इसके हर चरण में 22 मात्राएँ होती हैं। 13 और 9 पर विराम होता है। जैसे –
राधिका छंद के उदाहरण –
बैठी है वसन मलीन पहिन एक बाला।
बुरहन पत्रों के बीच कमल की माला।
उस मलिन वसन म, अंग-प्रभा दमकीली।
ज्यों धूसर नभ में चंद्रप्रभा चमकीली।।
11. त्रोटक छंद-
इसके हर चरण में 12 मात्रा और 4 सगण होते हैं। जैसे –
त्रोटक छंद के उदाहरण –
शशि से सखियाँ विनती करती,
टुक मंगल हो विनती करतीं।
हरि के पद-पंकज देखन दै
पदि मोटक माहिं निहारन दै।।
12. भुजंगी छंद-
हर चरण में 11 वर्ण , तीन सगण , एक लघु और एक गुरु होता है। जैसे –
भुजंगी छंद के उदाहरण –
शशि से सखियाँ विनती करती,
टुक मंगल हो विनती करतीं।
हरि के पद-पंकज देखन दै
पदि मोटक माहिं निहारन दै।।
13. वियोगिनी छंद :-
इसके सम चरण में 11-11 और विषम चरण में 10 वर्ण होते हैं। विषम चरणों में दो सगण , एक जगण , एक सगण और एक लघु व एक गुरु होते हैं। जैसे –
वियोगिनी छंद के उदाहरण –
विधि ना कृपया प्रबोधिता,
सहसा मानिनि सुख से सदा
करती रहती सदैव ही
करुण की मद-मय साधना।।
14. वंशस्थ छंद-
इसके हर चरण में 12 वर्ण , एक नगण , एक तगण , एक जगण और एक रगण होते हैं। जैसे –
वंशस्थ छंद के उदाहरण –
गिरिन्द्र में व्याप्त विलोकनीय थी,
वनस्थली मध्य प्रशंसनीय थी
अपूर्व शोभा अवलोकनीय थी
असेत जम्बालिनी कूल जम्बुकीय।।
15. शिखरिणी छंद –
इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं। चार चरण होते हैं। इसमें 6 एवं 11 अक्षर पर विराम होता है। इसके हर चरण में यगण , मगण , नगण , सगण , भगण , लघु और गुरु होता है।
बड़ा ही प्यारा है, जगत भर में भारत मुझे।
सदा शोभा गाऊँ, पर हृदय की प्यास न बुझे।।
तुम्हारे गीतों को, मधुर सुर में गा मन भरूँ।
नवा माथा मेरा, चरण-रज माथे पर धरूँ।।
16. शार्दूलविक्रीडित छंद –
इसके प्रत्येक चरण में 19 वर्ण होते हैं। चार चरण होते हैं। 12 , 7 वर्णों पर विराम होता है। हर चरण में मगण , सगण , जगण , सगण , तगण , और बाद में एक गुरु होता है।
माँ विद्या वर दायिनी भगवती, तू बुद्धि का दान दे।
माँ अज्ञान मिटा हरो तिमिर को, दो ज्ञान हे शारदे।
हे माँ पुस्तक धारिणी जगत में, विज्ञान विस्तार दे।
वाग्देवी नव छंद हो रस पगा, ऐसी नयी ताल दे।।
17. मत्तगयंग छंद –
इसमें 23 वर्ण होते हैं। हर चरण में सात सगण और दो गुरु होते हैं। मत्तगयंद सवैया का एक पद (पंक्ति) में “भानस भानस भानस भानस भानस भानस भानस गुरु गुरु” , एक भानस = 3 वर्ण, तो सात भानस = 21 वर्ण और पीछे से दो गुरु गुरु वर्ण यानि कुल वर्णों की संख्या हुई, 21 + 2 = 23. यानि, मत्तगयंद सवैया = भगण × 7 + गुरु + गुरु।
पाप बढ़े चहुँ ओर भयानक हाथ कृपाण त्रिशूलहु धारो।
रक्त पिपासु लगे बढ़ने दुखके महिषासुर को अब टारो।
ताण्डव से अरि रुण्डन मुण्डन को बरसा कर के रिपु मारो।
नाहर पे चढ़ भेष कराल बना कर ताप सभी तुम हारो।।
काव्य में छंद का महत्व
छंद से ह्रदय का संबंध बोध होता है। छंद से मानवीय भावनाएँ झंकृत होती हैं। छंदों में स्थायित्व होता है। छंद के सरस होने के कारण मन को भाते हैं। जैसे :-
भभूत लगावत शंकर को, अहिलोचन मध्य परौ झरि कै।
अहि की फुँफकार लगी शशि को, तब अंमृत बूंद गिरौ चिरि कै।
तेहि ठौर रहे मृगराज तुचाधर, गर्जत भे वे चले उठि कै।
सुरभी-सुत वाहन भाग चले, तब गौरि हँसीं मुख आँचल दै॥
FAQs: छंद (Chhand) से जुड़े सामान्य प्रश्न
Q1. छंद (Chhand) क्या होता है?
उत्तर: वर्णों या मात्राओं की निश्चित संख्या और क्रम के आधार पर रचित काव्य संरचना को छंद (Chhand) कहते हैं। छंद कविता में लय, मधुरता और सौंदर्य उत्पन्न करता है।
Q2. छंद के मुख्य प्रकार कौन-कौन से हैं?
उत्तर: छंद के चार प्रमुख प्रकार होते हैं— वर्णिक छंद, वर्णिक वृत्त छंद, मात्रिक छंद और मुक्त छंद। इनकी रचना अलग-अलग नियमों और गणना पद्धतियों पर आधारित होती है।
Q3. वर्णिक छंद और मात्रिक छंद में क्या अंतर है?
उत्तर: वर्णिक छंद में वर्णों (अक्षरों) की संख्या और लघु-गुरु का क्रम निश्चित होता है, जबकि मात्रिक छंद में मात्राओं की संख्या निश्चित रहती है, लेकिन लघु-गुरु का क्रम आवश्यक रूप से समान नहीं होता।
Q4. हिंदी साहित्य में सबसे लोकप्रिय छंद कौन-से हैं?
उत्तर: हिंदी साहित्य में दोहा, चौपाई, सोरठा, रोला, हरिगीतिका, गीतिका और सवैया सबसे अधिक प्रचलित और लोकप्रिय छंद माने जाते हैं। इनका प्रयोग अनेक प्रसिद्ध कवियों और संतों ने अपनी रचनाओं में किया है।